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पनिपथ की तीसरी लड़ाई । Panipath ki teesri ladai

इतिहास ने हमे बहत कुछ दिया है। उस मे से कुछ बहुत अछा और कुछ बहत बुरा दिया है। इतिहास के हमे कुछ ऐसा दिया है जो हमे गौरंबिद क्या है और कुछ ऐसा दिया है जिसे सुनकर दिल बैट जाते है। ऐसा ही एक किस्सा है भारत की सबसे बड़ा युद्ध की । जिस युद्ध का नाम है पनिपथ का तीसरा युद्ध। आइए जानते है panipath ki teesri ladai की बिनाशकारी युद्ध जिसने हजारों युद्धा की जान लेली। आइए जानते है पनिपथ युद्ध की कुछ पहलों को।

Panipath ki teesri ladai
Panipath ki teesri ladai



Panipat war 3 in Hindi

18 वी शताब्दी की सुरुआत हो गई थी। मुगल सम्राट ऑरोनगएब के मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य का अंत सुरू हो गया था. और दूसरी तरफ मराठा की भागूआ पंचबुलंदी पर लेह रहा था।  मुगल साम्राज्य के ज्यादातर भागों मे शक्तिशाती मराठा की राज हो गया था। बिसवा बाजीराओ की नेतरेतत्य मे राजपूतना गुजरात के राजा मराठों के साथ मिले थे।

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माराठाओ की लगातार आक्रमण से मुगल की हालत बत्तर से भी ज्यादा बत्तर कर दिए थे। उत्तर भारत के राज्य पर जहा पहले मुगल समराट का शासन था अब सभी यह जगह  पर माराठाओ का अधिकार था। 1758 मे बिश्व बाजीराओ के पुत्र बालाजी बाजीराओ ने पंजाब को जीतकर मराठा समराज्य को और बिस्तर कर दिया। पर इनकी जितनी ख्याति बरती गई ओटनी ही शत्रु की संख्या भी बड़ती गई।  इसबर उनका सामना अफ़गान नबाब अहमद शाह आबदाली  के साथ था। अहमद शाह ने 1759 मे बलूच जंजानती को एकत्रित  करके एक बड़ा सेना का संघटित किया। इस तरह आपण सेना के साथ आगे बड़ता रहा। करीब डेढ़ महीने की मोर्चा बंदी के बाद 14 जनवरी सन् 1761 को बुधवार के दिन सुबह 8:00 बजे यह दोनों सेनाएं आमने-सामने युद्ध के लिए आ गई कि मराठों को रसद की आमद हो नहीं रही थी और उनकी सेना में भुखमरी फैलती जा रही थी उस वक्त तक हो सकती थी परंतु अहमदशाह को अवध और रूहेलखंड से हो रही थी युद्ध का फैसला किया इस युद्ध में मराठों की अच्छी साबित हुई ऐसा हुआ नहीं विश्वासराव को करीब 1:00 से 2:30 के बीच एक गोली शरीर पर लगी और वह गोली इतिहास को परिवर्तित करने वाली साबित हुई और सदाशिवराव भाऊ अपने हाथी से उतर कर विश्वास राव को देखने के लिए मैदान में पहुंचे जहां पर उन्होंने उसको मृत पाया बाकी मराठा सरदारों ने देखा कि सदाशिवराव भाऊ अपने हाथी पर नहीं है तो पूरी सेना में हड़कंप मच गया जिसे सेना का कमान ना होने के कारण पूरी सेना में अफरा तफरी मच गई और इसी कारण कई सैनिक मारे गए इसलिए कुछ छोड़ कर भाग गए परंतु सदाशिव राव भाऊ अंतिम दिन तक उस युद्ध में लड़ते रहे इस युद्ध में शाम तक आते-आते पूरी मराठा सेना खत्म हो गई ।अब्दाली ने इस मौके को एक सबसे अच्छा मौका समझा और 15000 सैनिक जो कि आरक्षित थे उनको युद्ध के लिए भेज दिया और उन 15000 सैनिकों ने बचे-खुचे मराठा सैनिक जो सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व में थे उनको खत्म कर दिया ।मल्हार राव होळकर वहाँ से पेशवा के वचन के कारण साथ गई 20 मराठा स्त्रियों को युद्ध से सुरक्षित बडी ही कूटनीति से निकालकर लाए , सिंधिया और नाना फडणवीस इस से भाग निकले उनके अलावा और कई महान सरदार जैसे विश्वासराव पेशवा सदाशिवराव भाऊ जानकोजी सिंधिया यह सभी इस युद्ध में मारे गए और इब्राहिम खान गार्दी जो कि मराठा तोपखाने की कमान संभाले हुए थे उनकी भी इस युद्ध में बहुत बुरी तरीके से मौत हो गई और कई दिनों बाद सदाशिव राव भाऊ और विश्वासराव का शरीर मिला इसके साथ 40000 तीर्थयात्रियों जो मराठा सेना के साथ उत्तर भारत यात्रा करने के लिए गये थे उनको पकड़ कर उनका कत्लेआम करवा दिया। पानी पिला पिला कर उनका वध कर दिया गया। एक लाख से ज्यादा लोगों को हमेशा के लिए युद्ध मे मारे गए यह बात जब पुणे पहुंची तब बालाजी बाजीराव को गुस्से का ठिकाना नहीं रहा वह बहुत बड़ी सेना लेकर वापस पानीपत की ओर चल पड़े जब अहमद शाह दुर्रानी को यह खबर लगी तो उसने खुद को रोक लेना ही सही समझा क्योंकि उसकी सेना में भी हजारों का नुकसान हो चुका था और वह सेना वापस अभी जो भी नहीं लग सकती थी इसलिए उसने 10 फरवरी,1761 को पेशवा को पत्र लिखा कि "मैं जीत गया हूं और मैं दिल्ली की गद्दी नहीं लूगा, आप ही दिल्ली पर राज करें मैं वापस जा रहा हूं।" अब्दााली का भेजा पत्र बालाजी बाजीराव ने पत्र पढ़ा और वापस पुणे लौट गए ।परंतु थोड़े में ही 23 जून 1761 को उनकी मौत हो गई डिप्रेशन के कारण क्योंकि इस युद्ध में उन्होंने अपना पुत्र और अपने कई सारे मराठा सरदारों को महान सरदारों को खो दिया था पानीपत के साथ एक बार आता साम्राज्य की सबसे बड़ा दर्द हुआ और 18 वीं सदी का सबसे भयानक युद हुआ और अंत में यह भारतीय इतिहास का सबसे काला दिन रहा सभी को मार दिया गया वापस लौटने भारत का सबसे बड़ा कई सारी विदेशी ताकतें भारत में आने लगी परंतु 1761 में माधवराव द्वितीय पेशवा बने और उन्होंने महादाजी सिंधिया और नाना फडणवीस की सहायता से उत्तर भारत में अपना प्रभाव फिर से जमा लिया । 1761 से 1772 तक उन्होंने वापस रोहिलखंड पर आक्रमण किया और रोहिलखंड में नजीर दुला के पुत्र को भयानक पूरी तरीके से पराजित किया और पूरे panipat ki teesri ladai रोहिल्ला को ध्वस्त कर दिया नजीबुदौला की कब्र को भी तोड़ दिया और संपूर्णता भारत में फिर अपना परचम फैला दिया और दिल्ली को वापस उन्होंने मुगल सम्राट शाह आलम को वापस दिल्ली की गद्दी पर बैठाया और पूरे भारत पर शासन करना फिर से प्रारंभ कर दिया महादाजी सिंधिया और नाना फडणवीस का मराठा पुनरुत्थान में बहुत बड़ा योगदान है और माधवराव पेशवा की वजह से ही यह सब हो सका वापस मराठा साम्राज्य बना बाद में मराठों ने ब्रिटिश को भी पराजित किया और सालाबाई की संधि की। पानीपत का युद्ध भारत के इतिहास का सबसे काला दिन रहा। और इसमें कई सारे महान सरदार मारे गए जिस देश के लिए लड़ रहे थे और अपने देश के लिए लड़ते हुए सभी श्रद्धालुओं की मौत हो गई इसमें सदाशिवराव भाऊ, शमशेर बहादुर, इब्राहिम खान गार्दी, विश्वासराव, जानकोजी सिंधिया की भी मृत्यु हो गई।इस युद्ध के बाद खुद अहमद शाह दुर्रानी ने मराठों की वीरता को लेकर उनकी काफी तारीफ की और मराठों को सच्चा देशभक्त भी बताया।

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इस युद्ध में मराठा के लगभग सभी छोटे-बड़े सरदार मारे गए इस संग्राम पर टिप्पणी करते हुए जे.एन.सरकार जादुनाथ सरकारने लिखा है इस देशव्यापी विपत्ति में संम्भवत महाराष्ट्र का कोई ऐसा परिवार ने होगा जिसका कोई न कोई सदस्य इस युद्ध में मारा न गया हो !

 

 


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